Wednesday, 1 May 2013

मैं विद्रोही

मैं धारा के विपरीत चला विद्रोही हूँ
फ़िर भी अपनी मति-कृति का सन्तत मोही हूँ।।

अद्भुत अशान्त भावों का उठा बवन्डर हूँ
मैं धरती को धारे कठोरतम मन्दर हूँ
निभ्रान्त जगत की मैं अदम्य तरुणाई हूँ
निर्धूम वह्नि की या प्रदीप्त परछाईं हूँ।।१।।

मैं हूँ सरिता का स्रोत सरल पथ की सीमा
संघर्षण का उद्योत शक्ति का अथ भीमा
मैं अन्तरिक्ष की ज्वाला का आमंत्रण हूँ
धरती की ज्वालामुखियों का अभिमंत्रण हूँ।।२।।

मैं हूँ विश्वास, निरीहों की उच्छवासों का
अम्बर में अटकी दृष्टि दिशाओं स्वासों का
उर में कराल कालाग्नि पचाने की क्षमता
आँसू अनुताप कराहों पर पूरी ममता।।३।।

विगलित हिमाद्रि आत्मदान की अमर चाह
अविराम जाह्नवी का हूँ पापांकुश प्रवाह
मैं हूँ सर्जन की दिशा, दशा षोडशोपचार विसर्जन की
मैं बाल्मीकि की व्यथा, कथा अनचाहे कठिन प्रवर्जन की।।४।।

मैं हूँ संताप, विलाप नहीं परिकर प्रबोध की परिभाषा
विभ्रम विलास की अनल ज्वाल, ठुकराये जीवन की आशा
मैं सहज प्रखर संदीप्त अन्धतम की ललकार सनातन हूँ
जौहर की ज्वाल कराल, दमकती ज्योति यशस्वी हूँ।।५।।

उद्भ्रान्त प्रवंचन के पथ का मैं धधक रहा तीसरा नयन
बलिदानी दिशा निहार किया हर बार कनिष्ठाधार चयन
क्या देख रहे, पथ छोड किनारे लगो, दम्भ का द्रोही हूँ
दुर्धर अनन्त संघर्षों का सौदागर, चिर विद्रोही हूँ।।६।।


............................................................ ओमशंकर

Wednesday, 9 January 2013

मैं हूँ अलमस्त फ़कीर

मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है
दुनिया से दूर जमीर नहीं ऐयारी आती है।।

दुनिया के सब दस्तूर निराले हैं
दिखते भर उजले सचमुच काले हैं
इस जग का सर सामान न सस्ता है
दस-द्वारी खुला मकान विवशता है
सुखदायी सलिल-समीर कभी तट-नीर न आती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।१।।


दुनिया दुनियादारों की कब होती
औचक ही खँजर तान खडी होती
अपनी अपनी अपनों की भाषाएँ
मन मोह रही मृगजल की आशाएँ
बोझिल हो गया शरीर पीर अब कहाँ सुहाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।२।।

हँसना-खिलना चलना रोना गाना
तूफ़ानों में घिर फ़िर-फ़िर घबराना
बीती विपत्ति पर हँसना खो जाना
यह राग पुराना फ़िर भी अनजाना
अब गयीं बहारें बीत नहीं पुरवाई भाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।३।।

बैरागी मन की रीति अनोखी है
पल में उदास पल भर में शोखी है
पतझार सँवारे पल्लव की राहें
झुलसी निदाध ने मधु ऋतु की चाहें
उठ रही हिये में हूक मूक वह कोयल गाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।४।।

जो भी होना है होने दो यारों
मत पग-पग पर टकरा-टकरा कर रो
मिलना-टलना दहना-बहना सहना
अपनों से अपनी पीर नहीं कहना
सब समय-समय की बात समय की टेर बुलाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।५।।

..................................................... ओमशंकर


Tuesday, 25 December 2012

गीत मैं लिखता नहीं हूँ

गीत मैं लिखता नही हूं।
लाख कोशिश कर थका पर सामने दिखता नही हूँ।
गीत मैं लिखता नहीं हूँ।।

वर्जनायें हार थक कर बैठ जाती
वंचनायें मस्त मन-मन गुनगुनाती
याद डूबी साँझ झपकी ले रही है
और अपने हाथ थपकी दे रही है
ठिठकता हर ठौर, पर टिकता नहीं हूँ।
गीत मैं लिखता नही हूँ।।

पथ अभी भी हार कर आवाज देता
पर न पहले सा चपल अँदाज होता
पंथ ही पाथेय सुख दे रहा है
हर हवन में मन स्वयं होता रहा है
धार में घुलमिल गयी माटी, विरस सिकता नही हूँ।
गीत मैं लिखता नही हूँ।।

राह से हारा नहीं, युग का छला हूँ
चाह की कारा न, निर्जन में पला हूँ
नियति की चिन्ता नहीं, गति पर भरोसा
आ मिले परिणाम को किंचित न कोसा
स्वर्ण का सौदा नही, मैं भाव हूँ, बिकता नहीं हूँ।
गीत मैं लिखता नहीं हूँ।।

युग-प्रवर्तन की अनूठी भूमिका हूँ
सत्य-चित्रण की अनोखी तूलिका हूँ
नियति के आगे न किंचित विवश हूँ
जगत की हर रीति का अंतिम निकष हूँ
भर दिये अनगिन चषक, मैं सिन्धु हूँ, चुकता नहीं हूँ।
गीत मैं लिखता नही हूँ।।

हो रहा जो भी उसे क्यों सह रहा हूँ
चाह कर भी क्यों नही कुछ भी कह रहा हूँ
मँजिलें अब भी बुलावा भेजती हैं
भावना पाथेय को क्यों देखती हैं
प्राण मेरे ! अब न क्यों लिखता सही हूँ।
गीत मैं लिखता नही हूँ।।


___________________ ओमशंकर

Sunday, 23 December 2012

शाश्वत सुकून

मैं अपने प्राणों को पीकर पलता और
समाज की लाज बचाने के लिये
राहों पर
अपना कफ़न
ओढ कर चलता हूँ।

मैं एक ऐसा बँजारा हूँ
जिसके पास
गिरह बाँधने के लिये
सूत का एक टुकडा नहीं
और इस अभागी दुनिया को
भरमाने के लिये
किसी तरह का
मुखौटा चढा मुखडा भी नहीं।

मैं एक
अलमस्त फ़कीर हूँ
जिसकी झोली में
अपनी तकदीर
और मुट्ठियों में
खुद्दारी की तासीर नजरबन्द है।

मैं इंसान का पुतला भर नहीं
रूहानी ताकत का पैगाम
और अरमानों के अमृत से
छलकता हुआ जाम हूँ।

इसके अलावा
सूखे बरगद की ठठरी में
उलटे लटके चमगादडों को
जगाते, भगाते रहने वाला
जुनून
और भीतर ही भीतर
मस्त रहने वाला
शाश्वर सुकून हूँ।।


------------------ ओमशंकर


Saturday, 10 November 2012

माटी की मूरतें

माटी की मूरत बनाते आधी बीत गयी
टुकडे-टुकडे सभी हो गयीं एक से एक नयी।।

माटी जिसमे बसी महक, जीवन की हरियाली
दुखिया का दुख दूर करे, कुछ ऐसी खुशहाली
दुनिया के गलीज को अपने भीतर मौन सिये
अन्धकार को पिये, सजाये ऐसे नये दिये
वही पूत धरती की जाया अपने हाथ लगी
विहँस उठी कल्पना, खिल उठी दुनिया नई नई।
माटी की मूरत बनाते आधी बीत गयी।।१।।

हँसी दिशायें, बोला अम्बर, पुरवा झूम उठी
छोड उदासी, उठी चेतना, तज सुनसान कुटी
ममता की पीडा क्षमता भर भरने को आया
दुनिया को दुनिया से कुछ-कुछ दूर उठा लाया
किन्तु हाय दुर्भाग्य, न अपनी दुनिया छोड सका
इसी लिये मेरी माटी मुझसे ही  रूठ गई।
माटी की मूरत बनाते आधी बीत गयी।।२।।


----------------------- ओमशंकर

Thursday, 24 May 2012

मुझको भावी से मतलब क्या




मुझको भावी से मतलब क्या, मैं वर्तमान का हामी हूँ।
हो कोई साथ नहीं फ़िर भी अपने पथ का अनुगामी हूँ।।

महलों से हुआ न मोह कभी, कुटिया से नहीं गुरेज रहा
वैभव से चाव, अभावों से उतना न कभी परहेज रहा
मैनें मगहर को कब कोसा, काशी की कहाँ चिरौरी की
जिस धज से गोमुख को पूजा, तट ’कर्मनास’ की भँवरी की
हो नाम किसी का इससे क्या, मैं नाम नहीं नामी हूँ।
हो कोई साथ नहीं फ़िर भी अपने पथ का अनुगामी हूँ।।१।।

अपनी मीनार उठाने को मन्नत मानी हो याद नहीं
उसकी दीवार न बन पाये जिद और नहीं फ़रियाद कहीं
संबल साधा आदर्शों का मृगतृष्णा हो अथवा यथार्थ
सुख-सूत्र सँवारे नहीं कभी, श्रीमन्तों से होकर कृतार्थ
खोने पाने का चाव नहीं, मैं आत्मदान का कामी हूँ।
हो कोई साथ नहीं फ़िर भी अपने पथ का अनुगामी हूँ।।२।।

मैं कहाँ रहा किस दर भटका, इसका न हिसाब लगाया है
भीतर झाँका देखा पाया, हर दर अपनी ही छाया है
अब व्यर्थ मुझे दहलाना या बहलाना किसी बहाने से
हो गयी चाल बेहाल, हुई नदिया दो-चार मुहाने से
फ़िर सभी नजारे देख हो गया अपनेपन का स्वामी हूँ।
हो कोई साथ नहीं फ़िर भी अपने पथ का अनुगामी हूँ।।३।।

आकुल प्राणॊं को पी-पीकर पाले अपने विश्वास विवश
अरमानों की आहुतियों से वेदी धधकाई रात - दिवस
संकल्प अधूरे झोली में, पाँवों की चाल निराली है
झँझायें उठने से पहले ही अपनी जोत बुझा ली है
जानता स्वर्ण-नगरी है यह, पर ओढे सीतारामी हूँ।
हो कोई साथ नहीं फ़िर भी अपने पथ का अनुगामी हूँ।।४।।

संकेत व्यर्थ हों जहाँ, वहाँ अंकुश की भी औकात नहीं
रातें मसान जब हो जायें तब सपनों की सौगात कहीं?
दर-दर पसरा है बियावान, सुनसान हमारा सहचर है
हर पोर फ़कीरी बाने में, बस अँधकार भर अनुचर है
पग बढा रहा भरपूर, मगर लगता है विवश विरामी हूँ।
हो कोई साथ नहीं फ़िर भी अपने पथ का अनुगामी हूँ।।५।।

मुझको भावी से मतलब क्या, मैं वर्तमान का हामी हूँ।
हो कोई साथ नहीं फ़िर भी अपने पथ का अनुगामी हूँ।।


......................................... ओमशंकर

Sunday, 6 May 2012

ओ जमीर देश के जगो


          ओ जमीर देश के जगो
          ओ फ़कीर देश के जगो
          ओ कबीर देश के जगो
          ओ समीर देश के जगो


सिन्धु सो रहा मसान में, हिन्द रो रहा जहान में,
अद्रि की शिखा अँगार है, जाह्नवी बडी उदार है,
दीप खूब जल रहे मगर अन्धकार से भरी डगर
कर्म की धुरी लचक गयी, धर्म की कमर मचक गयी
सत्य की जबान बन्द है, न्याय का विधान मन्द है
धूल फ़ाँकती सरस्वती, भोग में पगे सभी यती
शील अब लहू लुहान है, मेनका चढी मचान है
विश्व को विजय किया भले, आत्महीनता पडी गले।

          ओ सुधीर कर्म में पगो
          ओ जमीर देश के जगो।।१।।


सत्य दल गया प्रपंच से, नीति के विधान मंच से,
हर घडी विवश उदास है, कैद मे पडा हुलास है,
नीति में नही विधान है, धन सभी जगह प्रधान है,
सत्य का प्रभाव कण्ठ तक, सद्विचार सिर्फ़ ग्रन्थ तक,
ढोंग भर बची उपासना, फ़ूल फ़ल रही कुवासना,
कालनेमि रोज बढ रहे, आँजनेय मंत्र पढ रहे,
शून्य है स्वदेश-भावना, थक गयी अखण्ड साधना।

          ओ प्रवीर देश के जगो
          ओ जमीर देश के जगो।।२।।



...................................... ओमशंकर

दुनिया वालों मत समझो कंगाल


कितनों को चाहा मैने अपनी दुनिया में
लेकिन वे जाने अनजाने छूट गये
जितनों को थाहा जाकर उनकी दुनिया में
छिछले थे इसलिये व्यर्थ में रूठ गये
बस इसी लिये पैगाम कबीरी लाया हूँ।
दुनिया वालों, मत समझो कंगाल
असल सरमाया हूँ...................।।१।।


दुनिया नयी निराली सबकी प्यारी है
जंगल झाडी बगिया कहीं कियारी है
अलबेले व्यवहार घुमावी रस्ते हैं
लगते हैं दमदार असल में सस्ते हैं
यह बाजार सजा है दुनिया वालों का
छटे लुटेरों का बेकस रखवालों का
कहीं लगा दरबार इन्द्र का रौनक से
करती है परिहास मेनका शौनक से
कहीं सलोने सपने हैं जमुहाई में
बीत रही ज़िन्दगी कहीं तनहाई में
बजते झाँझ-मृदंग सबेरे मन्दिर में
जगते ज्वार शाम को छिपे समंदर में
देखो अपना रूप आइना लाया हूँ।
दुनिया वालों, मत समझो कंगाल
असल सरमाया हूँ...................।।२।।


पास न मेरे दौलत या मक्कारी है
और दुरंगों से की कभी न यारी है
किस्मत की सीढी को कभी न साधा है
साथ निभाती आई जग की बाधा है
इसीलिये ठोकर खाने का आदी हूँ
खाते पीते घर की बस बरबादी हूँ
कहता हूँ पर कहीं न सुनने वाला है
कहने का तुक तेवर तनिक निराला है
दुनिया है मदमस्त सलोनी राहों में
सपनों की तस्वीर बसी है चाहों में
घुटन है विश्वास तडपती ममता है
लकवा मारी पडी युवा की क्षमता है
इसीलिये मन की मशाल जला रोशनी लाया हूँ।
दुनिया वालों, मत समझो कंगाल
असल सरमाया हूँ...................।।३।।



................................. ओमशंकर


Wednesday, 14 March 2012

मैं



मैं अन्तरतम की आशा हूँ, मन की उद्दाम पिपासा हूँ
जो सदा जागती रहती है, ऐसी उर की अभिलाषा हूँ।।

मैंने करवट ली तो मानो, हिल उठे क्षितिज के ओर-छोर
मैं सोया तो जड हुआ विश्व, निर्मित फ़िर-फ़िर विस्मित विभोर
मैने यम के दरवाजे पर दस्तक देकर ललकारा है
मैंने सर्जन को प्रलय-पाथ पढने के लिये पुकारा है
मैं हँसा और पी गया गरल, मैं शुद्ध प्रेम परिभाषा हूँ
मैं अन्तरतम की आशा हूँ, मन की उद्दाम पिपासा हूँ।।१।।

मैं शान्ति-पाठ युग के इति का, मैं प्रणव-घोष अथ का असीम
मैं सृजन-प्रलय के मध्य सेतु, हूँ पौरुष का विग्रह ससीम
बैखरी भावनाओं की मैं, सात्वती सदा विश्वासों की
मैं सदियों का आकलन बिन्दु, ऊर्जा हूँ मैं निश्वासों की
पर परिवेशों में मैं जब-तब लगता है घोर निराशा हूँ
मैं अन्तरतम की आशा हूँ, मन की उद्दाम पिपासा हूँ।।२।।

मैं हूँ अनादि, मैं हूँ अनन्त, मैं मध्यदिन का प्रखर सूर्य
मैं हिम-नग का उत्तुंग शिखर, उत्ताल उदधि का प्रबल तूर्य
दिग्व्याप्त पवन उन्चास और मैं हूँ अन्तरिक्ष का कृशानु
मैं माटी की सद्गन्ध और रस में बसता बन तरल प्राण
पर आत्म-बोध से रहित स्वयं मैं ही मजबूर हताशा हूँ
मैं अन्तरतम की आशा हूँ, मन की उद्दाम पिपासा हूँ।।३।।

मैं स्रष्टा का उत्कृष्ट सृजन पालन कर्ता का सहयोगी
मैं हूँ विध्वंस कपाली का, हूँ प्रलय का अनुयोगी
मैं ही इतिहास रचा करता, बूमिति के बिन्दु हमारे हैं
अटके भटके पथ-भेदों के मैंने संबन्ध सुधारे है
पर चला और पथ भूल गया मैं क्षिप्त चित्त की भाषा हूँ
मैं अन्तरतम की आशा हूँ, मन की उद्दाम पिपासा हूँ।।४।।

जब सोया तो सपने देखे, जब जगा, सोच कर रोता हूँ
अपने इन गँदले हाथों से प्रग्या मल-मल कर धोता हूँ
छिप गया क्षितिज में सिन्धु-सूर्य मैं ठगा रह गया खडा
अपनी ही आँखों से देखा मैं अपने से हो गया बडा
हारे समस्त उपमान, अभी तक मैं प्यासा का प्यासा हूँ
मैं अन्तरतम की आशा हूँ, मन की उद्दाम पिपासा हूँ।।५।।


............................................... ओमशंकर


Sunday, 4 September 2011

बोलो स्वदेश के स्वाभिमान




बोलो स्वदेश के स्वाभिमान

नगराज हिमालय कटा, सिन्धु की धार बँटी, कश्मीर लुटा
कैलास, मानसर, हिंगुलाज तीरथ का पावन तीर बँटा
संगीत आरती का, पूजा की शंख ध्वनि खो गयी कहाँ
माँ ढाकेश्वरी पूछने आती है हमसे हर रोज यहाँ
क्यों हुआ नहीं विक्षुब्द सिन्धु, क्यों मौन अभी तक आसमान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [१]

अँधियारे में भारत भटका, लटकी क्यों तौंक गुलामी की
क्यों स्वाभिमान को भूल हाथ, आदत लग गयी सलामी की
क्यों विश्व गुरु का सिंहासन, आसन बन गया खिलौनों का
मृगराज भूल शार्दूल भाव, क्यों दास हो गया छौनों का
पहले जैसा क्यों रहा नहीं पूरब का सूरज भासमान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [२]

भाषा भावों की तरी, परी कल्पना लोक की ज्योतिमान
क्यों भटक रही पतवार-हीन, टूटे उल्का जैसी निदान
यह विश्वंभरा धरा क्यों ताका करती बैठे शून्य गगन
क्यों दुविधाग्रस्त जवानी है, आचरणहीनता मस्त मगन
उजडे हाटों से लौट-लौट क्यों आते हैं रोते किसान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [३]

क्यों लोकतंत्र का जामा मक्कारों की करनी ढकता है
सच कहने वालों को समाज क्यो समझ रहा "यह बकता है"
क्यों पूरब का भविष्य, पश्चिम के महलों मे तय होता है
पुरुषार्थ विभ्रमित, कुण्ठाएँ नाहक क्यों सिर पर ढोता है
क्यों बदला जाता है सुविधाओं के लिये सदन में संविधान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [४]

शिक्षा जीवन का संस्कार, क्यों हुई पेट की परिभाषा
शिक्षित कहलाता वही, बोलता जो केवल धन की भाषा
परिवार हुए बाजार, स्वार्थ पर पलते हैं रिश्ते-नाते
दौलत के लिये पराए भी अपनों से बढकर हो जाते
क्यों दिया जलाती नही साँझ, तन्द्रा मे रहता क्यों विहान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [५]

क्यों धर्म-कर्म, सेवा-सुधार, पूजा-प्रवचन व्यापार हुए
शंकाओं में सहमे-सहमे, चूल्हे-चौके घर-द्वार हुए
बेशक स्वतंत्र हो गया देश, पर जन-जीवन अब भी गुलाम
प्रतिभा बेचारी भटक रही, करती फ़िरती सबको सलाम
क्यों श्रीमन्तों के कदम छोड जाते गहरे काले निशान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [६]

मुँह फ़ेर रही प्रतिभा हताश क्यों अपने ही घर आँगन से
क्यों रूठ गयी है पुरवाई, अपने मन-भावन सावन से
अब क्यों आदर्शों के चेहरे सीमित रह गए प्रबन्धों में
क्यों सदाचार की परिभाषा सिमटी है सिर्फ़ निबन्धों मे
क्यों राजनीति में उभर रहे हर रोज नए नारे, निजाम।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [७]

भारत भारती खोजता है, कवि खोज रहा ऊँची दुकान
पकवान भले ही सीठा हो पर दुनिया मे बढ रही शान
यह थोथा जीवन, अपनो का आदर्श कभी भी रहा नहीं
बस इसीलिये वह लहरों पर तिर, मुर्दों जैसा बहा नही
क्या उखड बहेगा युग-युग से लहराता भारत का निशान।
बोलो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [८]

यह सब कुछ क्यों हुआ, जब कभी सोंचा अपने चिन्तन से
हम भूल गये अपना स्वरूप, फ़िर छोडा साथ चिरन्तन ने
चेतना हुई बेजार कलेवर की पूजा जब शुरू हुई
दासी का मान बढा इतना, वह सारे घर की गुरू हुई
बस इसीलिये सब उलट-पुलट हो गया विधाता का विधान।
समझो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [९]

भारत कर्ता की जन्मभूमि कर्मठता का यह सामगान
सागर की छाती चीर लिखा करता उस पर अपने निशान
हों पूत कपूत भले युग के, पर कोख धरा की बाँझ नही
अम्बर पर बदली घिरी भले, पर अभी दिवस है साँझ नही
सूरज बरसायेगा रोली अक्षत कह "भारत चिर महान"।
जागो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [१०]

भारत फ़िर से भा रत होगा दुनिया को राह दिखायेगा
धन केवल साधन, साध्य नही, जन-जन को पुनः सिखायेगा
जो भटक रहे अँधियारे मे, जी रहे जुगुनुओं के बल पर
उस बियावान से उन सबको लाना है फ़िर से समतल पर
तब फ़िर से दुनिया गायेगी "भारत महान भारत महान"।
जय हो स्वदेश के स्वाभिमान॥ [११]

............................................. ओमशंकर


Saturday, 23 July 2011

धन्य धीरजी दोस्त धन्य



संसार बडा भोला भाला, फ़िर भी क्यो उससे विरति मुझे
निस्सार नियति के झोंके हैं, है याद नही कुछ सुरति मुझे।


इतिहास एक है सत्य तथ्य, उसका क्यों रूप सुहावन हो
है कर्मों का फ़ल तिक्त तीक्ष्ण, चाहे क्यों मनभावन हो
शैवाल वासना से लिबदी, जल राशि जिन्दगी की मैली
फ़िर भी लकदक परिधान बने पहचान पावनी युग शैली।


क्या सत्य और क्या झूठ मात्र परिभाषा के ताने-बाने
विश्वास-दगा सब काल रूप, कोई माने या मत माने
जीवन में रस भी है शायद, यह भी शंका के घेरे में
है काठ बना चलता फ़िरता, पुतला अनचाहे फ़ेरे में।


क्या करना है किसको कब तक इसका निर्धारण कौन करे
ऋण भरना है अनजानों का, जल्दी निस्तारण करो अरे
है प्रगति ज़िन्दगी की थाती यह भी सुख की कल्पना सुखद
गति की अनुभूति तभी तक है, जब तक क्षण आते नही दुखद।


पर दुख तो जीवन संगी है, विश्वास भरा हमराही है
जीवन है हर समझौते का "आँखों देखता" गवाही है
फ़िर भी उससे मुँह फ़ेर फ़ेर, जाने कितनी राहें बदली
विश्वास दिया अपघात लिया, लकडी सी सूख गयी कदली।


पर धन्य धीरजी दोस्त धन्य, हर मोड, खडे, तत्परता से
काँटे बबूल के फ़िर कम हैं तुम जीत गये नश्वरता से
मैं किन्तु नही हारा फ़िर भी, हारी मेरी कल्पना प्रबल
स्वर क्षीण किन्तु कुछ कहती है, अब भी मेरी साधना सबल।।






................................................................. ओमशंकर त्रिपाठी

Tuesday, 19 July 2011

खो मत धैर्य

हाय ! जग कुछ सोचता पर मर्म जाने कौन मेरा
मैं निराशा का पथिक पर आश का परिवेश मेरा
हृदय में जलती व्यथा के दहकते अंगार मेरे
पर मृदुल शीतल चतुर्दिक दे रहे संभार फ़ेरे।


आह अन्तर में संजोयी राह सूनी सी पडी है
भाव अधसूखे, उधर वह चाह संकोचिन खडी है
स्नेह जलकर भस्म बन नीचे धरातल पर पडा है
अधर पर बरबस मधुर मुस्कान धारण कर खडा है।


मैं किसे पीडा सुनाऊं कौन मेरी सुन सकेगा
कौन सह-अनुभूति का सच्चा ग्रहण-कर्ता बनेगा
कौन सुनकर वेदना, दो अश्रु के कण ढाल देगा
और अपना भी हृदय, पर-वेदना से साल देगा।


पास किसके बैठ अन्तर खोल किसको दिखाऊं
हाथ मे ले कर कलेजे से कहो किसको लगाऊं
छद्मवेशी मैं कहो फ़िर कौन खुलने पर रहेगा
किन्तु ! खो मत धैर्य बहुवेशी तुम्हारा साथ देगा।




.......................................................... ओमशंकर त्रिपाठी

Thursday, 14 July 2011

समय है अब भी चेतो जागो

भावना नियति की आँच न जब सह पाती।
तब अन्तर्पीडा नयनों में छा जाती॥


श्वासों की छलना जब मन को छलती है
ज्वाला धरती से अम्बर तक जलती है
जब सत्य सुधा विषमान त्यक्त होता है
संकेतों से बैखरी व्यक्त होती है
जब हृदय-हृदय की दूरी है बढ जाती
सूखी सरिता की छाती भी फ़ट जाती॥


जब स्वत्व सत्य से आतंकित रहता है
आंचल प्रसूत से ही शंकित रहता है
जब अनुनय की भाषा प्रपंच होती है
परवाह धर्म की जब न रंच होती है
सुख-सुविधायें जब परिपाटी हो जाती
यह दिव्य देह बस माटी भर रह जाती॥


इसी लिये समय है अब भी चेतो जागो
सविता से दीप्त विवेक मुखर हो मांगो
संयम साधना सुकर्म धर्म को जानो
अपनों को अपने से पहले पहचानो
देखो बेसुध माता आँचल फ़ैलाती
माँगो विवेक की आँख वज्र की छाती॥




................................................ ओमशंकर त्रिपाठी

Tuesday, 10 May 2011

सुख की छाँव कहाँ



दुनिया पीडा का प्रवास है सुख की छाँव कहाँ,
महल राजपथ सोना चाँदी अपना गाँव कहाँ ।
सुख की छाँव कहाँ ।।

क्षणजीवी बैराग न मन को कभी तनिक भाया
रोम-रोम में समा गयी मृग की कंचन काया
अपना कौन पराये कितने आस - पास बैठे
मन माफ़िक तस्वीर बनाने को मन में ऐंठे
अपने पाँव थके बेसुध हैं, अभी पडाव कहां ।
सुख की छाँव कहाँ ।।

संयम शील साधना सूनी कुटिया के बन्दी
अपने शिव को ढूंढ रहा अपने मन का नन्दी
अभी समय है चेत उठो उपदेश घनेरे है
कैसे समझूँ समझ सभी मुटठी मे तेरे है
चौपड सजी निहार रहा हूँ, अपना दाँव कहाँ ।
सुख की छाँव कहाँ ।।

प्रथा व्यथा बन गयी कथा कैसे खोलूँ अपनी
मुँह में लगी लगाम निगाहे सबकी तनी-तनी
सुनते थे प्रवास का सुख सम्मोहन होता है
रंग बिरंगी दुनिया सुख संजीवन देता है
तपती रेत बूँद को तरसे सीपी, नाव कहाँ ।
सुख की छाँव कहाँ ।।

अभी सबेरा हुआ नही संझा भी घिर आयी
चार कदम दौडे सपाट में फ़िर गहरी खाई
चमचम गोटे सजे हाथ के, इतने पास नही
फ़िर भी उचक रहा हूँ मरियल मरती आस नही
जेठ तप रहा सिर के ऊपर, बट की छाँव कहाँ ।
सुख की छाँव कहाँ ।।

अरे प्राण के मीत न तुमको अब भी भूला हूँ
पता नही क्यों बना हुआ टहनी का झूला हूँ
सन्देहों की घिरी घटाये निष्ठा रूठ गयी
काँधे की पाथेय पुटकिया गिरकर छूट गयी
घना हुआ अँधियार, बनाऊँ अपना ठाँव कहां
अपना गाँव कहाँ ।
सुख की छाँव कहाँ ।।

.......................................................... ओम शंकर त्रिपाठी




Wednesday, 20 April 2011

मै - तुम



मैने गीत व्यथा के गाये, तुमने कथा शौर्य की बाँची,
मेरे मन मे भ्रमर गूंजते, तेरे संग कालिका नाची।

मै अथाह सागर सबकुछ पी लेने का अभ्यास हमारा,

पायस की उफ़नती नदी तुम, काट बहाती कूल किनारा,
मैं बट-छाँव जहाँ खग-मृग के साथ थका मानव सोता है,
तुम भविष्य का दाँव जहाँ संकल्पों को जीवन ढोता है ।

गगन गिरा गंभीर हमारी वाणी, प्राणवान करती है,
भैरव भरी समीर तुम्हारी, पाप जगत का हँस हरती है,
मै अनन्त की दिशा, दशा हो तुम अनादि के रूप राशि की,
भाषा की लक्षणा अभी मैं, तुम नाटक की वृत्ति कैशकी ।

मै संसार, असार तुम, मै विहार और तुम कण्ठहार हो,
नदी पार का तट सुरम्य मैं, तुम तटनी की दुसह धार हो,
तुम हो बीन रागिनी मै हूँ, मै प्रभात तुम कलरव स्वर हो,
अन्तरमन का भाव अमर मै, वाणी का तुम राग मुखर हो ।

मै या तुम अथवा मै - तुम का यह संसार समन्वित फ़ल है,
हुआ आज जो जिस गति-मति से वो जगत का निश्चित कल है,
इसी लिये मै - तुम महत्वमय माने जाते इस प्रपंच मे,
किन्तु न मै समझ सका अपने को, समझ सका न तुम्हे रंच मै ॥



............................................................................... ओम शंकर त्रिपाठी



Saturday, 9 April 2011

ओ तपस्वी



ओ तपस्वी !!
सिन्धु से गम्भीर, हिमनग से अचल उज्ज्वल यशस्वी ।
ओ तपस्वी !!

साधना के दीप शुचिता के धरोहर
कर्म के संगीत शुचि मानस मनोहर
भावधन, विश्वास के विग्रह, जगत के ओ जयस्वी ।
ओ तपस्वी !!

राष्ट्र की प्रेरक कथा, कविता समय की
आर्ष-कुल कि सत्प्रथा शुचिता मलय की
ओ भगीरथ के अदम्य प्रयास जैसे ऊर्जस्वी ।
ओ तपस्वी !!

शक्ति की आराधना सेवा सनातन
भक्ति की उदभावना ममता चिरन्तन
मातृमन्दिर के अखण्डित दीप से ज्योतित जयस्वी ।
ओ तपस्वी !!

सहज-सेवा भावना निष्काम तन मन
पावनी भागीरथी सा दिव्य जीवन
दिव्य देवोपम हिमालय से परम पावन पयस्वी ।
ओ तपस्वी !!

प्रखर प्रतिभा के प्रकीर्ण प्रकाश अनुपम
सत्य की संकल्पना से मूर्त संयम
ओ यती सेवाव्रती, त्यागी, विरागी, ओ मनस्वी ।
ओ तपस्वी !!

...................................................................... ओमशंकर त्रिपाठी



Friday, 8 April 2011

जागो ! जागो भविष्य के कर्णधार



जागो भविष्य के कर्णधार, पन्ने अतीत के करते तेरी आतुर पुकार।
तू खोल नयन उनको निहार, जागो ! जागो भविष्य के कर्णधार ।।

इतिहास ग्लानि मे गलता है, भगवान राम की याद लिये
गीता के पन्ने मौन बने, अन्तरतम में अवसाद लिये
रणभेरी का का दिशिव्यापी स्वर, फ़िर अनायास ही बैठ गया
कृष्णवन्तो विश्वमार्यम का नारा क्यों हमसे रूठ गया
क्यो बनी अनमनी सी फ़िरती, गंगा यमुना की चपल धार
अम्बुधि-अन्तर से आती है, अवसाद भरी धीमी पुकार ।
तू खोल नयन उनको निहार, जागो ! जागो भविष्य के कर्णधार ।।

सन्देह तुम्हे हो रहा आज, अपनी ही कृतियों के ऊपर
निष्क्रिय-कृत्यों के बीच पडे, ढहती सी आशायें लेकर
तुम मौन साधना के साधक, अब मुखरित हो पर व्यर्थ बने
जीवन जालों में उलझे हो, कुन्ठाओं के ही अर्थ बने
देखो फ़िर से असहाय बनी, धरती के अन्तर की पुकार
गीता गायत्री की आँखों से, अविरल ढहती है अश्रुधार ।
तू खोल नयन उनको निहार, जागो ! जागो भविष्य के कर्णधार ।।

उद्वेगजन्य अन्तर लेकर, तुम घूम रहे हो लक्ष्यहीन
माँ अन्नपूर्णा के आँगन में रहकर भी बन रहे दीन
संसार सदा ही याचित था, तेरे सम्मुख ही दान श्रेष्ठ
अब तू ही बना भिखारी है तज कर आदर्श महान श्रेष्ठ
विकृत परम्परायें ले कर, ग्यानी-पिपासु में भ्रम विकार
तज उभय पक्ष के कर्म कलुष, अन्तस में भर ले सदविचार ।
तू खोल नयन उनको निहार, जागो ! जागो भविष्य के कर्णधार ।।

................................................................................. ओमशंकर त्रिपाठी




Thursday, 24 March 2011

मै अमा का दीप हूँ



मै अमा का दीप हूँ, जलता रहूँगा ।
चाँदनी मुझको न छेडे आज, कह दो ॥

जानता हूँ अब अंधेरे बढ रहे हैं
क्षितिज पर बादल घनेरे चढ रहे है
आँधियाँ कालिख धरा की ढो रही है
व्याधियाँ हर खेत में दुख बो रही हैं
फ़ूँक दो अरमान की अरथी हमारी
मैं व्यथा का गीत हूँ, जलता रहूँगा ।
मै अमा का दीप हूँ, जलता रहूँगा ।।

मानता हूँ डगर यह दुर्गम बहुत है
प्राण का पाथेय चुकता जा रहा है
आँधियाँ मन की जलाशय खोजती हैं
भावना का यान रुकता जा रहा है
सिन्धु से कह दो गगन की आस छोडे
चाँदनी का क्रीत हूँ, गलता रहूँगा ।
मै अमा का दीप हूँ, जलता रहूँगा ।।

साधना की सीप मोती को तरसती
कामना मुरझा गयी किलकारियों की
पवन की साँसें अटकती जा रही हैं
याचना सकुचा रही शरमा रही है
नलिन अब दिनमान को चाहे न चाहे
पथिक हूँ, अविराम गति चलता रहूँगा ।
मै अमा का दीप हूँ, जलता रहूँगा ।।

...................................................... ओमशंकर त्रिपाठी




Monday, 14 March 2011

तुम्हारे दिव्य रथ पर



कह गये कब स्नेह से तुम थे विदा लो
खोज लो अन्यत्र अपना वास, जीवन अधखिला है।

कब झटक कर बाँह अरुणायी संजोये
तोड दी डोरी प्रणय की भावनाओं से सँवारी।

तुम गये आश्वस्त करके मीत मेरे
लौटने की लौ लगी ही रह गयी है
स्नेह की शहनाई कुछ गूँजी अधर में
भावना की टेक टूटी कह गयी है ।

जब विदा ही माँगने मुझसे चले थे
उस बेचारे के लिये भी सोंच लेते
स्वयं की बोई हुई लोनी लता को
उस बिदाई के समय ही नोंच लेते।

हो चुकी होती तभी निश्चिंत मै भी
शुष्क हो कर्तव्य के इस अग्नि पथ पर
झिलमिला कर जल प्रकाशित कर जगत को
आ मिली होती तुम्हारे दिव्य रथ पर।



................................................... ओमशंकर



Thursday, 10 March 2011

राष्ट्र मंदिर का पुजारी


राष्ट्र मंदिर का पुजारी, मुक्ति का कामी नही हूँ ।

त्याग का पाथेय अक्षय पास मेरे
क्रूर कंटक दलन का उत्साह प्रेरे
विश्वविजयी भावना से मै भरा हूं
मै न अल्हड बाल या जर्जर जरा हूँ
हूँ पथिक अविराम, क्षण भर भी सुखद विश्राम का कामी नही हूँ ।
राष्ट्र मंदिर का पुजारी, मुक्ति का कामी नही हूँ ।।

पंथ दुर्गम है कठिन भी जानता हूँ
विघ्न-बाधायें बहुत है मानता हूँ
लक्ष्य का उन्नत शिखर अति दूर दुस्तर
फ़िसलता चमचम चिलकता पंथ प्रस्तर
सततता का मैं अथक अभ्यास, कुंठित हार का हामी नही हूँ।
राष्ट्र मंदिर का पुजारी, मुक्ति का कामी नही हूँ ।।

साधना का दीप हरदम ही जला है
भावना-संगीत अंतर मे पला है
रूठकर सुविधा सलोनी जा चुकी है
वह विराग बयार भी मुरझा चुकी है
लक्ष्य अच्युत अभय संधान, यश का किन्तु अनुगामी नहीं हूँ।
राष्ट्र मंदिर का पुजारी, मुक्ति का कामी नही हूँ ।।

मै चला हूँ और चलता ही रहूँगा
अंधतम में ज्योति बन जलता रहूँगा
मोह के बादल भले घिर घोर छाये
द्रोह की काली घटाय्रं रीत जायें
सूर्य की पहली किरण का गीत मैं, अँधियार का हामी नही हूँ।
राष्ट्र मंदिर का पुजारी, मुक्ति का कामी नही हूँ ।।

हो निराशा की भले घर-घर कहानी
झूम झंझायें उठे खोये निशानी
जान्हवी पथ सिंधु का भ्रम भूल जाये
अंधतम रवि को भले ही लील जाये
शुध्द शोणित का उमडता ज्वार हँ, पानी नही हूँ।
राष्ट्र मंदिर का पुजारी, मुक्ति का कामी नही हूँ ।।