Wednesday, 9 January 2013

मैं हूँ अलमस्त फ़कीर

मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है
दुनिया से दूर जमीर नहीं ऐयारी आती है।।

दुनिया के सब दस्तूर निराले हैं
दिखते भर उजले सचमुच काले हैं
इस जग का सर सामान न सस्ता है
दस-द्वारी खुला मकान विवशता है
सुखदायी सलिल-समीर कभी तट-नीर न आती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।१।।


दुनिया दुनियादारों की कब होती
औचक ही खँजर तान खडी होती
अपनी अपनी अपनों की भाषाएँ
मन मोह रही मृगजल की आशाएँ
बोझिल हो गया शरीर पीर अब कहाँ सुहाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।२।।

हँसना-खिलना चलना रोना गाना
तूफ़ानों में घिर फ़िर-फ़िर घबराना
बीती विपत्ति पर हँसना खो जाना
यह राग पुराना फ़िर भी अनजाना
अब गयीं बहारें बीत नहीं पुरवाई भाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।३।।

बैरागी मन की रीति अनोखी है
पल में उदास पल भर में शोखी है
पतझार सँवारे पल्लव की राहें
झुलसी निदाध ने मधु ऋतु की चाहें
उठ रही हिये में हूक मूक वह कोयल गाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।४।।

जो भी होना है होने दो यारों
मत पग-पग पर टकरा-टकरा कर रो
मिलना-टलना दहना-बहना सहना
अपनों से अपनी पीर नहीं कहना
सब समय-समय की बात समय की टेर बुलाती है
मैं हूँ अलमस्त फ़कीर मुझे तकदीर न भाती है।।५।।

..................................................... ओमशंकर


2 comments:

  1. कई बार पढ़ी, अब भी मन में अनुनादित हो रही है।

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  2. ati uttam ...........................srimaan ji

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